Friday, 25 October 2013

हिन्दी के नाम पर रस्म अदायगी



हर वर्ष की भाँति 1 4  सितम्बर को हिंदी दिवस मनाने की  परंपरा अपने देश में चली आ रही है । इस साल भी बड़े धूम धाम से यह परंपरा अपने देश में एक दिन के लिए अपनायी गई ।    हमारी सबसे बड़ी गलती यह है क़ि है हम  अपनी मातृ भाषा को अपने देश में ही सम्मान नहीं दिला  पाये हैं । आज़ादी के पैसठ से ज्यादा साल बीतने के बाद भी हिन्दी  भाषा उपेक्षित है । हिंदी भाषा को देश की एक बड़ी आबादी समझती है । विश्व के कई मुल्को की बात करें तो वहाँ उनकी राष्ट्र भाषाएं  सबसे पहले बोली जाती है लेकिन भारत में ऐसा नहीं है ।

      लगभग आधी आबादी जिस भाषा को हमारे यहाँ समझती है वहाँ  हम  उस  भाषा के साथ काम करने में शर्म महसूस करते हैं । हमें यह नहीं भूलना चाहिए आजादी के हमारे आंदोलन में कई समाचार पत्रो ने हिंदी भाषा में अपने विचारो की अलख जगाकर सोये जनमानस को आगाह किया था । हिन्दी  भाषा ने उस समय एक  दू सरे के विचारो के प्रचार प्रसार में अपना महत्वपूर्ण  योगदान दिया । लेकिन आज की हमारी  नई नवेली पीड़ी हिंदी को भूल चुकी है । वह अंग्रेजी बोलने में  आगे है । उसने अंग्रेजी विचारो को इस तरह अपने अंदर आत्मसात कर लिया है क़ि  हिंदी अपनी आखरी सांस गिन रही है । देश की  युवा पीड़ी आज हिंग्लिश के जरिये जवान हो रही है वहीँ लोगो में अपने बच्चो को कान्वेंट स्कूल में पढ़ाने का चलन शुरू हो गया है जहाँ सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजी में ही पढ़ाई लिखाई होती है । वहाँ  पर हिंदी बोलने वाले को कमजोर समझा जाता है । यही नहीं सरकारी आफिसो में भी आजकल सारा काम हिंदी एके बजाये अंग्रेजी में ही होने लगा है । यह हिंदी भाषा के लिए एक बड़ा खतरा है । इस दिशा में देश के युवाओ को एक लम्बी लड़ाई लड़ने की  जरुरत है ।

                                                                                      हिमांशु बतरा
                                                                                    छात्र --पत्रकारिता और जनसंचार विभाग
                                                                                                 प्रथम  सेमेस्टर

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