हिंदी भाषा कोई साधारण भाषा नहीं है । यह हमारी भारतीयता का प्रतीक है । यह प्रतीक है हमारे भारत के गौरव और सम्मान का । अंग्रेजी और चाइनीज भाषा के बाद हिंदी भाषा की सर्वाधिक बोली जाती है । इस भाषा का अपना अलग महत्व है । संस्कृत के बाद यह एक ऐसी भाषा है जो देवनागिरी लिपि में लिखी जाती है ।
भारत के अधिकतर राज्यों में यह बोली और समझी जाती है । साथ ही विश्व के अनेक विश्व विद्यालयों में इसे पढाया जाता है । इतना प्राचीन इतिहास और मजबूत वर्तमान होने के बाद भी आज हमारी हिंदी का अस्तित्व खतरे में है । ऐसा मेरा नहीं हिंदी के बड़े बड़े साहित्यकारों और भाषा के जान कारों का मानना है । वर्तमान में हिंदी हमारी राजभाषा है और संविधान में इसे विशिष्ट भाषा का दर्जा मिला हुआ है ।
लेकिन आज उस पर अंग्रेजी भाषा हावी हो रही है । हिंदी भाषा लोगो के दिलो में राज करती है लेकिन वह लोगो की जुबान पर आते आते शरमा जाती है । हम आज हिंदी में बात करना अपमानजनक समझने लगे हैं । मेट्रो सिटी में तो इंग्लिश में बात करना एक रूतबे की बात है। यदि कोई टूटी फूटी अंग्रेजी भी बोलता है तो उसकी इज्जत में चार चाँद लग जाते हैं । लेकिन यदि कोई हिंदी में बात करता है तो आज उसका उपहास उड़ाया जाता है ।
भाषा किसी भी राष्ट्र की पहचान होती है और वह राज्य भाषा के बिना अपाहिज होता है । अंग्रेजी बोलना कोई गलत बात नहीं है लेकिन इंग्लिश के फेर में अपनी माटी की भाषा भूल जाना सही नहीं है । समाज में जहाँ पर लोग हिंदी नहीं जान पाते वहां पर अंग्रेजी में वार्तालाप करना जरूरी है लेकिन माटी की भाषा के साथ अन्याय पतन की तरफ ले जायेगा ।
हिंदी के विस्तार के लिए यह जरूरी है कि सरकारी दफ्तरों में हिंदी में काम काज होना चाहिए । बचपन से सभी विद्यालयों में हिंदी अनिवार्य विषय के रूप में शामिल की जानी चाहिए । साथ ही न्याय के मंदिरों के भी सभी जजमेंट हिंदी में ना केवल आने चाहिए बल्कि कोर्ट कचहरी में सुनवाई भी हिंदी में ही होनी चाहिए तभी हम हिंदी के साथ न्या य कर पाएंगे और तभी हिंदी दिवस जैसे उत्सवो की सार्थकता सिद्ध हो पायेगी । फिर शायद हम हिंदी को साल में एक दिन याद नहीं करेंगे , वो रोज हमारे साथ होगी ।
भिषाक मोहन शर्मा छात्र -- प्रथम सेमेस्टर
पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग

No comments:
Post a Comment