Sunday, 23 March 2014

आडवाणी की नाराज़गी और भाजपा..








आम  चुनाव के निकट आते ही  भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर  संकट में घिरती  नज़र आ रही है | भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ  नेता लालकृष्ण आडवाणी इसकी वजह  समझे जा रहे है। किसी न किसी बात पर आडवाणी की नाराज़गी शायद पार्टी  के लिए नई अब नई  मुश्किलें  पैदा कर सकती है। उनके इस रवैये पर अब   विपक्ष भी   खूब चुटकी ले रहे हैं । इससे आम जनता में  भी भाजपा की छवि पर  असर पड़  सकता है क्योंकि देश भर में कांग्रेस विरोधी  लहर  का लाभ अगर किसी को मिलता  दिख  रहा है तो वह है भाजपा है जिसे मोदी अपनी रणनीतियों  के जरिए नये  रूप में ढाल  रहे है। 

पार्टी ने आडवाणी  को  गांधीनगर से  चुनाव लड़ने को कहा, जहां से आडवाणी 1991   से चुनाव जीतते आ रहे है  लेकिन आडवाणी गांधीनगर के बजाय किसी अन्य  सुरक्षित सीट की तलाश में जुटे हैं ।  भाजपा ने उनके नाम का ऐलान भी कर दिया था।  लेकिन वह चुनाव भोपाल से लड़ने के लिये अड़े हुए थे।  जहां शिवराज सिंह चौहान उनके करीबी सहयोगी माने जाते है लेकिन मोदी इस बात पर अड़े है कि आडवाणी को चुनाव गांधीनगर से लड़ना  चाहिए। उन्होंने  आश्वासन  दिया है कि उनको  पूरा सहयोग मिलेगा।  लेकिन आडवाणी का तर्क था कि अगर  मोदी और पार्टी  अध्यक्ष राजनाथ सिंह अपनी पसंद की सीटो से चुनाव लड़ सकते है तो  वो अपनी अपनी पसंद से चुनाव क्यों नहीं लड़ सकते?

यह पहला मौका नहीं है जब आडवाणी इस तरह  कोपभवन में है।  आडवाणी ने राष्ट्रीय  कार्यकारिणी,संसदीय बोर्ड और चुनाव समिति से इस्तीफा दे चुके थे लेकिन संघ के हस्तक्षेप ने उनको  कोई बड़ा फैसला लेने से रोक लिया था।  अब एक बार फिर आडवाणी मोदी को रोकने के लिए अपना हर दाव
  फ्रन्ट  फुट  खेलकर  आगे  आना चाहते है।  लेकिन आडवाणी ने ऐसा पहली बार  नही किया है।  इससे पहले कई बार वो अपनी नाराज़गी जाहिर कर चुके है। पिछले साल जब पार्टी ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार  चुना तो उस समय भी आडवाणी को गुस्सा आया। मोदी एक समय आडवाणी के चेले  थे।और शायद आडवाणी को यह बात पची नही कि उनका चेला अब प्रधानमंत्री पद का सबसे प्रबल  उम्मीदवार  है।

आडवाणी 7  रेसफोर्स की आखिरी जंग  लड़ने को तैयार है। गुजरात में मोदी के मुख्यमंत्री बनने के समय आडवाणी ने उनका बहुत साथ दिया था। यही नहीं २००२ में गोधरा के दंगो  बाद जहां पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी  ने राजधर्म न निभा पाने के लिए मोदी को निशाने पर लिया वहीं आडवाणी के कहने पर मोदी की कुर्सी सलामत रही थीं।आडवाणी इस समय खुद को तन्हा  महसूस कर रहे है। मोदी के नेतृत्व  में बीजेपी  2 72  सीट से  अगर सरकार  नहीं बना पायी तो गठबंधन की   राजनीती  में आडवाणी का ही सपना पूरा होगा।  उनकी मौजूदा नाराज़गी शायद उनकी आखिरी नाराज़गी है।


Posted by  ANMOL JAIN BJMC THIRD SEM 

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